शुक्रवार, 19 जून 2009

पोस्टर



प्रदेष संस्कृति प्रकोप्ठ की महिला षाखा ने आज स्त्रियों के देह प्रदर्षन के खिलाफ षहर के प्रमुख मार्गों पर विरोध प्रदर्षन किया है। इसमें भारी संख्या में नारियों ने हिस्सा लिया । यह षहर में नारियों का ऐतिहासिक प्रदर्षन रहा। महिलाओं और कन्याओं ने संस्कृति के खिलाफ किए जा रहे कार्यों के प्रति एकजुट होकर षासन को अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। प्रकोष्ठ की महासचिव सुश्री विजया भारती ने कहा है कि ‘संस्कृति को दूषित करने वाले लोग अब सावधान रहेेंगे। फैषन परेडें आयोजित कराने वाले लोगों को कई बार सोचना पड़ेगा । सांस्कृतिक कार्यक्रमांे के नाम पर जांघो और स्तनों का प्रदर्षन संस्कृति नहीं है। हम अपने नगर में फैषन परेडें कतइ नहीं होने देंगे।’
ष्षहर के सांध्य अखबार में यह खबर इष्तहार की तरह चमक रही थी । अखबार बरबस ही लोगों का ध्यान खींच रहा था। इस घटना की मौखिक चर्चा पूरे षहर में थी । हां, अखबार में आने पर इसे नया मोड़ मिला गया था । अब लोगों के पास सुश्री विजया का बयान था। यही बयान लोगों के लिए चर्चा का नया मुद्दा बन चुका था।
इस जुलूस के बाद विजया के बारे में कहा जाने लगा कि ‘विजया कभी इस शहर की सीधी सादी लड़की थी । ़़़़़़़ ़ ़़ ़पर अब देखिए ़़ ़़़ ़।‘ मिसेज अंजली ने अखबार रख कर अपनी बेटी से कहा- ‘बेटी !‘ उनकी बेटी ज्योति ने आंखें उठा कर मां की तरफ देखा। ज्योति इससे पहले भी कई बार मां के मुंह से विजया का नाम सुन चुकी थीं। उसकी मां कहा करती थी - ‘इस दुबली पतली लड़की के बारे में इसकी मां बहुत चिचिंत रहती थी।‘ ज्योति ने प्रष्न भरी आखें फिर उठाईं । मां ने उसकी आंखों में देख कर कहा - ‘वही जो पिछले साल अपने यहां आई थी । तेरी कड़ी की खूब तारीफ की थी ।‘
थोड़ी देर ज्योति चुप रह कर बोली -
‘मम्मी विजया के बारे में ऐसे क्यों बता रहीं हो। मैं तो अच्छे से जानती हूं उसे।‘
वह अम्मी की आंखो में ऐसे देख रही थी जैसे कह रही हो आप जो जानती हो वो सवाल और उसका जवाब मुझे मालूम है। मम्मी आगे बोलीं
‘-मेरे स्कूल के सामने से जुलूस निकला । तो मैं दंग रह गई। हे भगवान इतनी औरतें !..और यह विजया! तब मैं जान पाई के ये विजया का कमाल है। मुझे तो इंटर कालेज में इसकी स्पीच को सुन कर लगा था कि ये कुछ करेगी । तब ये इंटर की परीक्षा दे रही थी। तब से आठ साल हो गए । आठ साल कितने जल्दी बीत जाते हैं । तू कितने साल की हो गई ! विजया से तीन साल छोटी है तू।’ ज्योति ने उल्टे पेंडूलम की तरह अपने पेन को हिलाया - ‘उं उं मैं हूं रनिंग इन टवन्टी वन।’
‘चैबीस की होकर उसने जिले और स्टेट के ऊपर अपना नाम फैला दिया ।‘ मां ने कहा तो ज्योति ने छुपाकर मुंह बिचकाया।
‘मंै उससे मिलवाउंगी तुझे ,मंैने उसे क्लास में पढ़ाया है। तू मिल कर खुष होगी उससे।‘
‘क्यांे ज्योति के मुंह से निकला । गोद में गिरे इस ‘क्यों’ से अम्मी चुप थीं और ज्योति ने अपना मुंह किताबोें मे गड़ा लिया था। थोड़ी देर बाद ज्योति ने मां से कहा -‘मम्मी नाम होना जिंदगी जीने की कसौटी नहीं है। क्या तुम जानती हो मेरा नाम भी मेरी पेंटिंग के साथ जाने किन किन देषों में जा चुका है। लेकिन ये बात मायने नहीं रखती कि किसका कितना नाम है। बड़ी बात ये है कि जिंदगी के साथ आपका हंसना बोलना कितना हो पाता है । किसी से आपने पूछा कि नाम होने से वो जिंदगी भी जी लेता है । या के वो केवल अपने नाम को जीता है।‘
इसके बाद फिर मिसेज अंजली ने ज्याति से कई दिनों तक कुछ नहीं कहा।
$ $ $
2


विजया सफल विरोध प्रदर्षन के बाद अपने बिस्तर पर लेटी थी । रात गहरा रही थी। बादलों के कालेपन से अंधेरा और भयानक हो उठा था। हल्की गड़गड़ाहट अंधेरे में तैर रही थी । गर्जन इतनी आरोही अवरोही थी कि लगता यह हमारे ही षरीर और मन के तनाव का घर्षण है। दूसरे ही क्षण जब ध्यान षरीर पर जाता तो लगता नहीं यह किसी विषाल घटना से उपजा हुआ षोर है। तभी बिजली चमकती और उस भयानकता का अहसास स्पष्ट हो जाता। विजया को लगा विषाल पहाड़ खिड़की में से उसके सिरहाने आ चुका है । अब वह धीरे धीरे उसके षरीर में प्रवेष कर रहा है । तभी उसके कानों को फाड़ देने वाली गड़गड़ाहट के साथ हल्के ठण्डे पानी के छींटे हवा के साथ चेहरे पर आ पड़े। बाहर बादल टहल रहे थे। किस बादल ने ऐसा किया है । उसे किसी बादल ने छेड़ा है। विजया को लगा कोई लड़का है। वह तमातमा गई। बिजली अब बार बार चमक रही थी।
-कितना अष्लील है सब कुछ।
बिस्तर छोड़ कर उसने खिड़की से बाहर देखा । मीलों लाइटें चमक रही थीं । ठण्डी हवाएं रह रह कर दरवाजे से टकरातीं और विजया के कमरे से होकर बाहर निकल रही थीं । बहुत थोड़ी देर रूककर अपने हाथांे को उठाया । कंधों की जकड़न मिटाकर आइने के सामने आ गई । ओह उसके मुंह से निकला। वह अपने ही वक्षांे और नितम्बों को देख रही थी । वह वापस मेज पर आकर बैठ गई । उसने अपने आप से पूछा- मैं आइने के सामने क्यों चली गई थी। क्या यह भी अष्लील है ? कोई खुद ही अष्लील क्यों हो सकता है । क्या खुद को देखना अष्लील हो सकता है। उसने विचार किया और उठ कर वापस आइने के पास चली गई । उसने अपनी टांगांे को चैड़ा किया । उसने गाउन को ऊंचा किया और देखने लगी । उर्मिला मातोडकर की टागें भी तो ऐसी हैं। आज उसने अपनी टांगें देखीं , वैसी ही थीं । अब इनका क्या करूं । उसे लगा कि ये टांगें उसकी नहीं हैं । उसकी ब्रेस्ट और हिप बडे़ हैं। ये सब किसके लिए हैं। ये किसी और के अंग हैं लेकिन बहुत पहले मुझ ये मेरे मुहं बोले भाई ने कहा था- तेरी गरदन तो गजब की सुराही वाली है। तब अच्छा लगा था लेकिन मां ने सुन लिया था और फिर कहा था ‘- अब तू पूरे गले वाला सूट पहनना षुरू कर दे विजया।‘ वह आइने के सामने मां हो गई और जो प्रतिबिंब दिख रहा था उसे डांटने लगी -ऐसे चैड़ी टांगे करके खड़े नहीं होते और न बैठते । कैसी बैठी है ? ठीक से बैठ।
और आज भी तो यही हुआ न. पार्टी के नेता कैसे उसकी कमर को छूने के कोषिष कर ते हैं । कैसे उसे दबोचते हैं. कभी कभी तो सच में उसे लगता- यह सब कितना गंदा है। एक तरफ हम उनके कहने पर पोस्टर फाड़ें और दूसरी तरफ रात में वे ही हमें दबोचने की कोषिषें करते हैं । मैं नहीं चिल्लाती तो जिलाध्यक्ष गौतम ने तो सुषीला को पकड़ ही लिया था. झिड़कने पर कहता है- ‘कोमन है ये सब ।‘ विजया सारे नेताओं की हरकतों और षब्दों के प्रयोग को हर वक्त पहचान लेती थी. वह जानती थी किस की कामना क्या है । लोग कभी बड़े बन कर, कभी मां की स्टाइल में, कभी दादा की स्टाइल में सामने आते या फिर छोटे होकर हृदय का रस पीने की कोषिष करते । कोई दोस्त बन कर कंधे पर हाथ रखने या लान में टहलने की जिद करता । कभी मुझे सच में डर लगता कि इतने सारे लोग यदि एक हो जाएं तो मेेरे षरीर को कैसा बना देंगे । यदि मैं किसी से दोस्ती करूं तो हर ओर से मेरे ऊपर छाने की कोषिष करते हैं। सब कुछ घृणित और गंदा लगता । विजया प्रतिबिंब पर ध्यान देती है। फिर ठीक से बैठ जाती । अपनी मां को याद करके खुद से ही कहती
‘-दुपट्टा डाल न । अपनी सहेलियों को देख कर कुछ सीख जा । देख सुरूचि अपना पूरा ध्यान रखती है । मजाल क्या है कुछ.........और तू है कि होष ही नहीं रखती अपना।‘
3

धीरे धीरे मुझे भी लगने लगा कि सच यही है। मां और सुरूचि ही सही हैं। क्योंकि तभी भाई भी यही कहता था- ‘विजया को कुछ होष नहीं रहता। दोस्तों के सामने न आया करे -मां इसे बोल दो।‘ वह गुस्से में बुदबुदाता जाता-इसमें बिल्कुल भी मैनर नहीं है। पापा ने आज तक कुछ नहीं कहा । तेज चलने और उछल कर निकलने पर आंखें जरूर दिखा देते थे। मैं समझ जाती कि अब उछलना बंद। मैं बहुत जोर से हंसती तब पापा दूसरे कमरे मे चिल्लाते -‘क्या है विजया ! तब मैं ही ही करते हुए चुप हो जाती । इस सब के बाद भी लगता कि सच्चाई कुछ और है । मन ये स्वीकार ही नहीं करता था।‘
विजया फिर बिस्तर पर लेट गई। हवा की लहरें खिड़की के परदों को झकझोर कर उसको छूने आ जाती थीं । उसने अपना चेहरा चादर से ढक लिया था । फिर भी उसे लग रहा था आसमान की पूूरी नमी उसके षरीर में बैठती जा रही है।
आज सारे दिन जो किया उसका सीन उसकी आखों में तैरने लगा. दुबली पतली लड़कियां उछल कर कालिख पोत रही हैं। पोस्टरों को फाड़ रही हंै। नारे की आवाज बुलंद कर रही थीं। विजया ने किसी पोस्टर को गौर से देखा और चिन्दी चिन्दी होते पोस्टर में खुद को देखने लगी । जहां भी लड़के लड़कियां कालिख पोतते उसे अच्छा लगता लेकिन अब उसके ही कमरे में क्यों लग रहा है कि यह कालिख उसके अंगो पर पुती है। पोस्टरांे को फाड़ते फाड़ते यह क्या देखने लगी । उसे पोस्टरों पर छपी हिप जांघे और डांस के चित्र अच्छे लगने लगे। सामने बिखरा सारा तामझाम अपने ही खिलाफ लगने लगा। वह खुद ही अपने खिलाफ लगने लगी । उसकी गति में ,उसके उत्साह में अनावष्यक उदासी झलकने लगी।
दूसरे दिन उसकी स्पीच में धार नहीं थी जो वह इससे पहले पैदा हो जाया करती थी । आज वह कह रही थी । हमारे विचार से यह सब जल्द बदल जाना चाहिए । हमंे अपने विवेक को जाग्रत करना होगा। आज उसके विचारों में इन पोस्टरों के प्रति भयावहता और डर नहीं था । आज विजया की आंखों में सच को स्वीकार करने के बाद आने वाली चमक झलक रही थी । यह कमजोरी झूठ की हजारों दहाड़ों से ज्यादा ताकतवर थी. षाम को विजया अपने कमरे मे आ चुकी थी । वह पहली बार इस आंदोलन के लिए इतनी उदास और अषांत थी । उसे लगा इस आंदोलन की नीव में कुछ गड़बड़ है । उसे और षामों से आज ज्यादा थकावट महसूस हो रही थी । लेटने से पहले उसने म्युजिक सिस्टम आॅन किया। कुछ देर लेटे रहने के बाद उठ गई । सिस्टम के पास आई और नई सीडी डाल दी । संगीत का असर विजया के मन और षरीर में फैल गया गया। पैरों में थिरकन नषे की तरह चढ़ने लगी थी । विजया डांस करने लगी थी । कांच मंे वह खुद को देख रही थी।
‘अरे जैसी ........‘उसने अपने हिपोेें को फिर हिलाया
षिफान का नाइट सूट उतार दिया और देखा उसका सब कुछ कल वाले पोस्टर जैसा है जिसे उसने एक राड में उलझा कर सड़क पर छितरा दिया था । उसने पोस्टर की तरह खुद को बनाया। आइना बता रहा था कि उसके कंधे हिप कमर और स्तन पोस्टर से भी अच्छे लग रहे थे । उसकी इच्छा हुई कि कोई उसका फोटो खींच ले और सब चैराहांे पर लगा दे । लेकिन यह संभव नहीं था । और वह फिर ए. आर. रहमान के संगीत पर डांस करने लगी।
अचानक रात में ज्योति के फोन की बेल आई। ज्योति उनींदे स्वर में थी -
‘हैलो ,मैं ज्योति हूं ।‘

4

-‘मैं विजया भारती बोल रही हूं। तुम अभी आ जाओ। मैं गाड़ी भेज रही हूं !‘
-‘किसलिए ? ‘
-‘तुम पेंटर हो न, इसलिए।‘
-‘मैं आपका चित्र दोपहर में आकर बनाउंगी। अभी आप बिलकुल तनाव और थकावट से फ्री हों.‘ दूसरे दिन सुबह उसने सेना के लड़कांे को बताया कि आज आंदोलन स्थगित रहेगा। उत्तेजित लड़के लड़कियां निराष हो गए थे। एक लड़के ने बताया भी कि आज मेडम नए अन्दाज में थीं । ज्यादा मुस्करा भी रही थीं । आज दीदी की हेयर स्टाइल कुछ अलग थी। बाहर जाकर लड़के कह रहे थे आज तो दीदी कुछ और ही थीं । विजया को मां की झिड़की याद आ गई। वह रात को उसके पैर हिला कर होष में आने के लिए कहती -देख कैसे सो रही है। उसका चादर एक तरफ हो जाता था और गाउन अपने आप घुटनों से ऊपर चला जाता था। उसने हाथ से छू कर देखा तो सच में गाउन ऊपर खिसका हुआ था । विजया तत्काल अपने घुटने मोड़ लेती और गाउन को खींच कर पैरांे पर डाल लेती । आज मां नहीं है और न कोई देखने वाला लेकिन उसे लगता है कि अंधेरा उसके पैर देख रहा है।
वह रात के निगेटिव में से बाहर निकल आई थी ।
जिस वास्तविकता के सामने खड़ी थी युवाओं का हुजूम उसके सामने था और धूप उसके सर पर चमक रही थी । पसीने की बूंदें उसकी लाल त्वचा पर मोती की तरह सजी थीं । उसके चेहरे पर आंदोलन की गरिमापूर्ण चमक थी। इस समय वह नेहरू चैक पर अपने आंदोलन को संचालित कर रही है । बहुत सारे लड़के विजया के चारों और खड़े हैं । भरा भरा माहौल बनता जा रहा है । कोई बहुत मसक्कत के बाद आता और दीदी के पैर छू कर अपने आप को धन्य करता । ऐसे लड़कों के सिरों पर विजया बहुत पवित्रता से हाथ रखती थी। सेना के लड़के भी आ गए थे - ‘दीदी हुक्म दो.‘ किसी ने अपने संगठन के नषे में चूर होकर कहा। किसी ने कहा-‘अब विजय हमारी है।’
विजया मुस्कुरा रही थी । लड़के और कुछ लड़कियां उनके आदेष का इंतजार कर रहे थे । सेल फोन विजया के कान से सटा था । कुछ लड़के कोलतार की कालिख डिब्बांे में लटकाए हुए थे । बहुत सोच समझ कर विजया दीदी ने अपने साथ लगे हुजूम को आदेष दिया। उन्होंने हाथ से इषारा किया । सब लोगों ने चिल्लाया -चलो। और हुजूम विजया के साथ आगे बढ़ने लगा। लड़कियां उत्साह में चीख रही थीं। लड़के विजय भाव से सांड़ों की तरह इधर उधर देख कर झूम रहे थे जैसे वे कोई अपराजेय सांड़ हैं। मानो उन्हें कोई पोस्टर दिखेगा और उसे अपने सीगों फंसा कर फाड़ डालेंगे । संस्कृति के खिलाफ किसी भी पोस्टर को देखने लायक नहीं बचने दंेगे । हूजुम धीरे धीरे मस्ती में बढ़ रहा था । बीच में से किसी ने नारा दिया
गंदे पोस्टर गंदगी हैं।
जुलूस चिल्लाया-गंदे पोस्टर गंदगी हंै। ठोस और भारी आवाजों का गोला उठा और आसमान में जाकर बिखर गया। व्यापारी, दुकानदार, ठेले वाले और ग्राहक सहम गए। दुकानदारों ने अपना सामान अंदर खींचते हुए कहा-कुछ भी हो सकता है। वे अंदर से किसी अनहोनी के डर से भर कर अपने काम में लग गए। हूजूम अपना ध्यान खींचने में सफल रहा था । व्यापारियों के चेहरों की निष्चिंत्ता खत्म हो चुकी थी । इस बार फिर किसी ने नारा दिया ‘-औरत के वस्त्र - औरत की षान हैं।‘
‘फैषन परेड नहीं चलेगी । नहीं चलेगी नहीं चलेगी।‘
आसमान गूंज गया। इसी चैराहे पर एक फिल्म के विज्ञापन पर कालिख पोत दी गई। विजया दीदी ने देखा कि पोस्टर में अण्डर बियर पहने एक लड़की डांस कर रही है । छातियां और कमर पूरी तरह दिख रही हैैंै । नाभि खुली है । हिप उभरे हंै । विजया को लगा यह अब सब उससे नहीं हो सकेगा . ‘वह सुंदरम से प्यार का इजहार करना चाहती है । सार्वजनिक लाइफ का मतलब यह तो नहीं होता कि अपनी ही मिट्टी कुटवाते रहो । यह सब पार्टी के मूर्खों की बकबास है । ‘
5


ष् ष्षाम की मीटिंग में उसने पार्टी को बता दिया कि ‘ ऐसे आंदोलन अब वह नहीं कर सकती । जल्दी ही इनकी दिषा बदली जाना चाहिए । मार्डन सोसायटी में अच्छा मैसेज नहीं जा रहा ।‘
अध्यक्ष महोेदय के सामने थोड़ी सी तू तू मैं मैं हुई । किसी ने कहा था- ‘दिषा ही बदल दो , साब दिषा ही आड़े आ रही है तो दिषा ही बदल दो ।‘ कुछ लोग मुस्कुराए थे । ज्यादातर मेंबर चुप ही रहे थे ।
अध्यक्ष महोदय ने मीटिंग के अंत में कहा -‘ तुम्हें बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार रहना चाहिए ।‘
विजया ने दूसरे दिन सुंदरम को फोन लगा कर कहा- ‘मैं अब इस काम से मुक्त हो रही
हूं । तुम कल अपनी कार लेकर आना. कहीं लंच पर चलेंगे।‘
लेकिन सुदर्षन रिजिड था । उसने रूखे स्वर में कहा- ‘जो बड़ी जिम्मेदारी तुमको बताई गई है , उसका कुल मतलब इतना है कि तुमसे प्रदेष महिला संस्कृति प्रकोष्ठ छीना जा रहा है।‘
‘-तब भी तुम षाम को आना तो । विजया के चेहरे में उत्साह की ध्वनी थी ।‘
‘-यार चार साल तुमको राजनीति करते हो गए . लेकिन इतना भी तमीज नहीं आया । राजनीति में ऐसी बातों के लिए बहुत ज्यादा गुंजाइष नहीं होती । आ सको तो मेरी लाबिंग करने पार्टी कार्यालय आ जाना , मैं प्रदेष महासचिव बनना चाहता हूं ।‘
विजया ने आहिस्ता से फोन के चोगे को रख दिया। निष्वांस भर कर कमरे के बीच में खड़ी हो गई । उसने महसूस किया - धरती की चट्टानें पिघल पिघल कर उसके सीने में जमती जा रही हैं। अब उसके हृदय में कुछ भी जीवित और हरा नहीं है। सब ओर जम चुकी चट्टानों का काला पठार फैल गया। वह फिर आइने के सामने खड़ी थी जेैसे आइना उसके दुखों का सबसे बड़ा साथी रहा है। उसने अपने चेहरे को देखा । चेहरा पीले कागज की तरह सपाट औेर भावहीन हो चुका था । उसने अपनी ही आंखों में देखा , वे आइने में छुपे हुए अपने हजारों खिलखिलाते अक्सों से ताकत ले रही थीं। एक तरफ सीने में जम चुका पठार था और दूसरी तरफ उसको पिघलाते हुए पुराने संघर्ष और हंसियां थीं । उसकी मुठ्ठियां ताकत से बंध गईं। अपना संघर्ष खुद ही तो जीतना है। आंखें बंद करके सोचने लगी . सुषीला को जगा कर कहा - ‘मैं पार्टी कार्यालय जा रही हूं । देर हो सकती है।‘ विजया जब बाहर निकली तो बहुत तेजी से परदे को हटाया . विजया के जाने के बाद उभरे शून्य में सुशीला खडे़ खड़े हिलते हुए परदे को देखती रही ।

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति
111 rajeev nagar vidisha

1 टिप्पणी:

  1. आम तौर पर ब्लाग पर कहानियां नहीं लगाते लोग्।
    शायद लंबाई इसकी एक वज़ह हो।
    पर मुझे कहानी अच्छी लगी।

    उत्तर देंहटाएं