गुरुवार, 21 मई 2009

इस शहर में

इस शहर में बहुत रोशनियां हैं चलो अंधेरे में चांद देखेंगे
किसी पुल पे बैठ कर चांदनी के शहर का ख्वाब देखेंगे

यहां लड़कियां चांद और सूरज की किरनों से बनी हैं
चलो उस गली में कोई वाह देखेंगे

इस शहर में भटकने के लिए बहुत मोड़ हैं
हम हर मोड़ पर खड़े होकर नई राह देखेंगे

इस शहर की दुनिया में कोई बात वाला है जरूर
हमें मिले न मिले वो हम हर शख्स में शाह देखेंगे

तुम मोड़ लो अपना चेहरा किसी अजनबी जैसे
देखना हमको है हम रोज़ तुममें नई चाह देखेंगे

2 टिप्‍पणियां:

  1. भाई रवीन्द्र ,हम तो तुम्हारे दोस्त हो चुके हैं..तुम्हे कुछ खबर है या नही? चलो अब पत्रिकाओं और संग्रहों के अलावा ब्लोग पर भी तुम्हारी कवितायें देखने को मिलेंगी.मेरे ब्लॉग पर भी एक चान्द है देख लेना.. और बढिया? शरद कोकास

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