बुधवार, 6 मई 2009

साहित्य में खेमों का खेल

खेमे की अवधारणा कोई नई और अजूबी नहीं है। दुनिया में हर विधा और कला में एक खास मानसिकता, व्यवहार और वैचारिकता के लोगों का धु्रवीकरण होता हैं। तुलसी ने भी खेमेबाजों से त्रस्त होकर कहा था- न मुझे किसी से एक लेना और न दो देना है। मुझे किसी को बेटी नहीं व्याहना है और न किसी के यहां बेटा। मुझे स्वतंत्रता से अपने काव्य में लीन रहने दो। मध्यकाल में एक लेखक वर्ग राज दरबारी था और एक वर्ग स्वतंत्र। राज दरबारियों में बिहारी जैसे कवि थे तो उसी युग में सूर और कबीर भी थे।
अगर हम आज की बात करें तो उस तरह के राज दरबार और सामंत नहीं रहे लेकिन अब सत्ता और सरकारें ये भूमिका निभा रही हैं। अधिक सटीक यह होगा कि खेमेबाज लेखक कलाकार स्वयं भी सत्ता के सामने अपनी योग्यता साबित करके लाभ पाने की कोशिश करते हैं। सत्ता को ऐसे लोगों को जरूरत होती है वह इनका संस्कृति के टूल्स की तरह इस्तेमान न भी करे तो कुछ लोग खुद ही टूल्स बन जाते हैं। जरूरी नहीं कि खेमेबाज सत्ता का विरोध न करें बल्कि वे तो विरोध को भी लाभ का हथियार बना लेते हैं। ऐसा कहना सच नहीं है कि खेमे में रह कर अच्छा नहीं लिखा जा सकता, कई अच्छे लेखक खेमों में हैं तो कई अच्छे लेखक बाहर भी हैं। लेकिन इतना तो है कि खेमे में रहने से व्यक्ति की स्वतंत्र चेतना आहत होती है।

बलराम गुमास्ता ने हमें खेमेबाज लेखकों की कुछ विशेषताएं बताते हुए कहते हैं -

खेमेबाजों के नेता साहित्य और राजनीति का वर्णसंकर होते हैं। ये आपस में एक दूसरे पर बयानबाजी करते हैं और एक दूसरे की सामाजिक साहित्यिक हैसियत बढ़ाते हैं। इस सत्य को ये जानते हैं जैसे दिल्ली में नामवर सिंह और राजेंद्र यादव। तो भोपाल के लोगों को हम सब जानते ही हैं। खेमेबाजी सिर्फ भोपाल में ही नहीं हो रही बल्कि ये गांवों कस्बों में भी पहुंच चुकी है।
दो खेमेबाजों का आपस का काम नहीं रुकता, उनके सारे काम होते हैं। चाहे वह पुरस्कार हो या फिर फैलोशिप।
दो खेमेबाजों के बीच में उनके चम्मच पिसते हैं। हालांकि अगर उनमें कोई वैचारिक और साहित्यिक रूप से मजबूत होता है तो वह कुछ ही दिनों में अपने ही बास से ताल ठोक लेता है।
खेमेबाज सबसे पहले एक वैचारिक आवरण ओढ़ता है। एक आंदोलन चलाता है। उसके नाम पर अपनी एक पार्टी खड़ी करता है। उसमें पुरस्कार, कार्यक्रम और आयोजन जैसी चीजें लेखक की प्रतिभा के हिसाब से नहीं होतीं बल्कि सर्मथन की गहराई और पिछल्लग्गूपन की निष्ठा से तय होती हैं।
हर खेमेबाज चाहता है कि उसके खेमे में कुछ अच्छे लेखकों
खेमे में रहने वाले लेखकों को यह भी न माना जाना चाहिए कि वे एक दूसरे खेमे के कट्टर दुश्मन होते हैं।
सभी खेमे के लेखक अपने गुणधर्मों के तहत महीने साल में कई बार मिलते रहते हैं, ताकि पता चल सके कि कौन क्या कर रहा है या उसकी क्या जुगाड़ है।
वे समारोहों एवं एक दूसरे खेमे के कार्यक्रमों में नहीं जाते।
खेमेबाज लेखक एकांत में सभी खेमे बाजों से अच्छे से मिलता है।
आपस में रोटी बेटी आदि की बातें भी हो जाती हैं।
सार्वजनिक रूप से किसी दूसरे खेमे के लेखक की तारीफ या विषेशता नहीं बताता।
एक खेमे के लोग किसी दूसरे खेमे के व्यक्ति से दोस्ती हो तो उसका विरोध करते हैं।
अक्सर कभी कभी खेमेबाजी , शीत युद्ध में भी बदल जाती है।

भोपाल की बात करें तो यहां भी लेखक सत्ता और लाभ (जो आर्थिक कम, ख्याति और साहित्यक महत्व पाने का अधिक होता है।) के लिए लेखकों में घमाशान होती रहती है। साहित्यकारों से किए एक सर्वे में भोपाल के दस सबसे बड़े खेमेबाजों का पता चला है। ये हैं -
कमलाप्रसाद
व्यवहारिक हैं, प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव, वसुधा के अघोषित कार्यकारी संपादक, दो पुरस्कारों के प्रमुख निणायक हैं। लेखकों की राष्ट्रीय राजनीति में माहिर। ज्ञानरंजन को खेमेबाजी में पछाड़ा। आजकल विजयी मुद्रा में। मध्यप्रदेश में लेखकों का सत्ताकेंद्र संचालित कर रहे हैं। हालांकि जब से भाजपा की सरकार है, थोड़े कमजोर महसूस कर रहे हैं। इसके बाद भी केंद्रीय संस्थानों में गहरी पैठ के चलते अपने खेमे के लेखकों को फायदा दिला देते हैं। हालांकि कमला प्रसाद से मिलने पर महसूस होता है कि वे अकेले हैं और बहुत मुश्किल में हैं। बहुत ही ठंडे दिमाग और संयत शब्दों में बातचीत करते हैं।
संगठन और पुरस्कार जिनके माध्यम से अपना खेमा संचालित करते हैं- वसुधा, प्रलेस, हिंदी साहित्य सम्मेलन, वागीश्वरी पुरस्कार और भवभूति अलंकरण।
प्रोफेसर और डीलिट की उपाधियां। अब तक पांच आलोचना पुस्तकें और कई राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय मंचों पर भाषण।

कैलाशचंद्र पंत
ने अपने कैरियर की शुरूआत छठे सातवें दशक में एक छोटे से अखबार के प्रकाशित करने और राजभाषा प्रचार समीति के साधारण सदस्य के रूप में की थी। राजभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष उस समय बैजनाथ जी हुआ करते थे। उनके वारिस के रूप में आपको हिंदी भवन का संस्थान मिला। आज राजभाषा प्रचार समिति के अंतर्गत कई भवन संचालित हैं। श्रीपंत भोपाल और मध्यप्रदेश में प्रगतिशील उर्फ कमला जी वाले खेमे के समानांतर सत्ता की स्थापना कर चुके हैं। हालांकि साहित्यिक महत्व और सक्रियता के हिसाब से इस खेमें में लेखकों की कमी है। पंत जी का कार्यलय अपनी गति से चलता है। व्यवहार में कैलाशचंद्र पंत शांत और शालीन हैं। अपने विरोधी खेमे के कार्यक्रमों में नहीं जाते। उनके करीब होने पर महसूस होता है कि वे अनुभवों का विशाल भंडार लिए हैं।
संगठन और पुरस्कार जिनके माध्यम से अपना खेमा संचालित करते हैं- राजभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन, पावस व्याख्यान माला और राजभाषा प्रचार समिति के पुरस्कार।

राजेश जोशी
बेहद मिलनसार, गर्मजोशी से मिलते हैं। अगर आप उनके साथ किसी कार्यक्रम में भोपाल से बाहर जाते हैं तो वे उस शहर की गलियों
सड़कों और गुमठियों पर घूमते मिल जाऐंगे। शायद कोई ऐसी सिगरेट की तलाश करते हुए जो शायद क्यूबा में बनी हो। अगर आप साथ हैं, और चाहें तो उनके साथ कस लगा सकते हैं। शहर, कविता और पुस्तकों पर चर्चा करते हुए।
एंक युवा आलोचक के अनुसार राजेश जोशी खेमेबाज नहीं हैं बल्कि खेमों का उपयोग अपने लिए करते हैं। उन्होंने शायद कोई संगठन अभी तक नहीं बनाया है। कहा जाता है कि जब कोई संगठन बनता है तो वे उससे जुड़ जाते हैं। उनकी कार्यशैली पर चर्चा करते हुए एक इंजीनियर कवि ने बताया कि पहले वो किसी भी संगठन के पदाधिकारी के लिए धकियाते हैं और फिर एप्रीसियेट करते हैं।


संतोष चौबे
संतोष चौबे का अपना कोई ब्रांडेड खेमा नहीं है लेकिन उनके मित्रों का एक विशाल समूह देश भर में है। वे आत्मर्स्फूत तरीके से अपनी रचनात्मक सत्ता को दर्शाते हैं। उनके चार से अधिक उपन्यास और कहानी संग्रह आ चुके हैं।


राजुरकर राज
भोपाल के कई साहित्यकारों के लिए राजुरकार राज मंच प्रदाता हैं तो कई के लिए एक साहित्य की राजनीति करने वाले। राजुरकर राज दुष्यंत कुमार स्मृति पांडुलिपि संग्रहालय के माध्यम से साहित्यिक गतिविधियां संचालित करते हैं। लेखकों के समाचारों से पूर्ण आप एक पत्रिका भी संचालित करते हैं। भोपाल के कुछ लेखकों का आरोप है कि वे उसी लेखक को अधिक प्राथमिकता देते हैं जो उनके काम आए या काम में आने वाला हो सकता हो। संग्रहालय कई अलंकरण प्रदान करता है। हालांकि एक युवा लेखक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राजुरकर के संस्थान को प्रतिभाशाली लेखकों से अधिक मतलब नहीं है। वे सिर्फ उन्हीं को अपने यहां बुलाते और सम्मानित करते हैं जो उनके खेमे को मजबूती प्रदान करे।

मुकेश वर्मा
मुकेश वर्मा की अब तक तीन कहानी संग्रह आ चुके हैं। आपके बारे में मनोज कुलकर्णी ने एक समारोह में कहा था कि मुकेश वर्मा अपने आप में संस्था हैं। मुकेश वर्मा के बारे में एक आलोचक का कहना है कि वे सौम्य हैं और बेहद सौम्य तरह की खेमेबाजी करते हैं। इसे व्यक्तिगत खेमेबाजी भी कहा जा सकता है। कहानी पाठ जैसे उनके आयोजन इसी तर्ज का हिस्सा हैं।

हरि भटनागर
हरि भटनागर का खेमा संख्याबल में बड़ा नहीं है लेकिन वे पूरे देश की साहित्यिक राजनीति करने का मन बना चुके हैं। लेखकों का आरोप है कि उन्होंने साहित्य अकादमी का उपयोग उन्होंने खुद को प्रोजेक्ट करने में किया है। श्री भटनागर ने कुछ वर्ष पहले कुछ दो मैगजीन इसीलिए निकालीं हैं कि दूसरे खेमेबाज उनकी साहित्यिक उपेक्षा न कर सकें। संगत और रचना समय ने उनको कई मायनों में बचाया है। भोपाल के कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने एक अंतराष्ट्रीय खेमे का निर्माण किया है। इनमें लंदन के तेजेंद्र शर्मा और रूस के अनिल जनविजय हैं।

अशोक बाजपेयी
आशोक बाजपेयी अब भोपाल की जगह दिल्ली में रहते हैं लेकिन उनके विचारों और खेमे को मजबूती देते हैं उनके पुरानी साथी। भोपाल का भारत भवन उनका सबसे बड़ा मंच था। हालांकि भगवत रावत कहते हैं कि अशोक बाजपेयी ने जो भी किया हो उन्होंने लेखकों के सम्मान और उनकी प्रतिष्ठा को कायम किया है। एक विशाल कला जगत को उन्होंने अपनी साहित्यिक कला से उचित मान दिया है। आशोक बाजपेयी एक सोसलिस्ट प्रजातांत्रिक की तरह अपना खेमा संचालित करते हैं।
आशोक बाजपेयी आज भी भोपाल की साहित्यिक विरादरी को जब तब प्रभावित करते रहते हैं। वे अपने हाथ के पुरस्कार और सम्मान सिर्फ अपने ही लोगों को बांटते हैं। हंस के पूर्व सहायक संपादक हरे प्रकाश उपाध्याय का आरोप है कि उन्होंने सम्मान का निर्णायक होने के कारण धु्रव शुक्ल को एक सम्मान इसलिए दिया था कि वे उनके ग्रुप के हैं। यह बात आशोक बाजपेयी ने स्वीकार भी की थी।

लीलाधर मंडलोई विभिन्न संस्थानों को सहायता एवं दुष्यंत कुमार संग्रहालय के माध्यम से अपना ग्रुप संचालित करते हैं। आजकल दिल्ली में हैं। आ
रामप्रकाश त्रिपाठी जनवादी लेखक संघ द्वारा

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अन्य छोटे खेमेबाज
कैलाश मड़वैया बुंदेली लोक साहित्य के माध्यम से
उर्मिला शिरीष- प्रलेस के माध्यम से

बिना खेमे से जुड़े सक्रिय साहित्यकार
मंजूर एहतेशाम- राष्ट्रीय स्तर के उपन्यासकार एवं कहानीकार।
भगवत रावत- खेमों द्वारा सबसे अधिक उपेक्षित। आठ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।
मालती जोशी- कहानीकार, कई पुस्तकें प्रकाशित।
रमेश चंद्र -शाह कहा जाता है कि आप खेमा संचालित नहीं करते लेकिन कई राष्ट्रीय खेमों में रहते हैं।
विजय बहादुर सिंह - आपकी कार्यशैली एकला चलो की है। कहा जाता है कि आप युवा साहित्कारों की फौज तैयार करते हैं। कविता एवं आलोचना कई पुस्तकें प्रकाशित। खेमेबाजों को लताड़ लगाते हैं।

खेमे के बारे में मंजूर एहतेशाम के विचार
खेमा इस्तेहार है
खेमे से कोई फायदा तो मुझे नहीं दिखता। मेरा मानना है कि खेमा सिर्फ चार दिन की चांदनी होता है। एक इस्तेहार की तरह है, जिसका असर जल्दी ही खत्म हो जाता है। लोगों को पहचानने में सदियां नहीं लगतीं। आप शुरुआती बढ़त ले सकते हैं लेकिन वह जल्दी ही सिमट जाती है। खेमे कुछ दिनों की राहत आपको दे सकते हैं। बाकी जो आपके दिल में है वह तो आपको ही लिखना होगा। इसलिए जो दिल में हो वही लिखना चाहिए। सारे खेमे एक तरह से ताकत की दवाओं के विज्ञापन की तरह हैं। किसी खेमे से जुड़ना इस्तेहार बाजी से ज्यादा कुछ नहीं है।

1 टिप्पणी:

  1. क्या यार रवीन्द्र.. इतनी अच्छी पोस्ट और कोई टिप्पणी नहीं, ये साहित्यकार लोग ब्लॉग देखते नही है क्या? भई हम लोग मध्यप्रदेश से जुदा क्या हुए खेमो और खेमेबाज़ों से ही जुदा हो गये.अब इस पर आह करो या वाह सच तो है.

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